अध्याय अष्टदश् (18)
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः अध्याय अष्टदश् ( 1 8) ********************* उसके उपरान्त अर्जुन बोले , हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन ! हे वासुदेव ! मैं सन्यास और त्याग के तत्व को पृथक - पृथक जानना चाहता हूँ । 1 । इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान बोले , हे अर्जुन ! कितने ही पण्डितजन तो काम्यकर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं और कितने ही विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं । 2 । तथा कई एक विद्वान ऐसे कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त हैं , इसलिये त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान ऐसे कहते हैं कि यज्ञ , दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं । 3 । परन्तु हे अर्जुन ! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन , हे पुरुषश्रेष्ठ ! वह त्याग सात्विक , राजस और तामस ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है । 4 । तथा यज्ञ , दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नहीं हैं , किन्तु वह निःसन्देह करना कर्तव्य है ; क्योंकि यज्ञ , दान और तप यह तीनों ही बु...