श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6 : आत्मसंयम योग
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः षष्ठम् अध्याय (6) ******************* उसके उपरान्त श्रीकृष्ण महाराज बोले , हे अर्जुन ! जो पुरुष कर्म के फल को न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है वह संन्यासी और योगी है और केवल अग्नि को त्यागने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं को त्यागने वाला भी संन्यासी नहीं है । 1 । इसलिये हे अर्जुन ! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं उसी को तू योग जान , क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता । 2 । समत्व - बुद्धिरूप योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्कामभाव से कर्म करना ही हेतु कहा है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष के लिये सर्वसंकल्पों का अभाव ही हेतु कहा है । 3 । जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होता है तथा न कर्मों में ही आसक्त होता है , उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है । 4 । यह योगारूढ़ता कल्याण में...

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