अध्याय षोडश (16)
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः
उसके उपरान्त श्रीकृष्ण भगवान् फिर बोले, हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा जिन पुरुषों को प्राप्त है तथा आसुरी सम्पदा
जिनको प्राप्त है, उनके लक्षण पृथक-पृथक कहता हूँ, उनमें सर्वथा भय
का अभाव, अन्तःकरण
की अच्छी प्रकार
से स्वच्छता, तत्वज्ञान
के लिये ध्यानयोग
में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्विक दान तथा इन्द्रियों
का दमन, भगवत्पूजा और अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों
का आचरण एवं वेद-शास्त्रों
के पठन-पाठनपूर्वक भगवान्
के नाम और गुणों
का कीर्तन तथा स्वधर्म पालन
के लिये कष्ट सहन करना एवं शरीर और इन्द्रयों
के सहित अन्तःकरण
की सरलता ।1। तथा मन, वाणी और शरीर
से किसी प्रकार भी किसी
को कष्ट न देना तथा यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करनेवाले
पर भी क्रोध
का न होना, कर्मों
में कर्तापन
के अभिमान
का त्याग एवं अन्तःकरण
की उपरामता अर्थात् चित्त
की चञ्चलता
का अभाव और किसी
की भी निन्दादि न करना तथा सब भूत-प्राणियों
में हेतुरहित दया; इन्द्रयों
का विषयों
के साथ संयोग होने
पर भी आसक्ति
का न होना और कोमलता तथा लोक और शास्त्र
से विरूद्ध आचरण
में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं
का अभाव ।2। तथा तेज, क्षमा, धैर्य और बाहर-भीतर
की शुद्धि एवं किसी
में भी शत्रुभाव
का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान
का अभाव यह सब तो हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष
के लक्षण हैं ।3।
हे पार्थ ! पाखण्ड, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध और कठोर वाणी एवं अज्ञान भी यह सब आसुरी सम्पदा
को प्राप्त हुए पुरुष
के लक्षण हैं ।4। उन दोनों प्रकार
की सम्पदाओं में दैवी सम्पदा तो मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने
के लिये मानी गयी है, इसलिये हे अर्जुन ! तू शोक मत कर; क्योंकि तू दैवी सम्पदा को प्राप्त हुआ है ।5।
हे अर्जुन ! इस लोक
में भूतों
के स्वभाव दो प्रकार
के माने गये हैं एक तो देवों
के जैसा और दूसरा असुरों
के जैसा, उनमें देवों
का स्वभाव ही विस्तारपूर्वक कहा गया है, इसलिये अब असुरों
के स्वभाव
को भी विस्तारपूर्वक मेरे
से सुन ।6। हे अर्जुन
! आसुरी स्वभाववाले मनुष्य कर्तव्यकार्य
में प्रवृत होने
को और अकर्तव्यकार्य
से निवृत होने को भी नहीं जानते हैं, उनमें न तो बाहर-भीतर
की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण और न सत्यभाषण ही है ।7। वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहते हैं कि जगत् आश्रयरहित और सर्वथा झूठा एवं बिना ईश्वर
के अपने-आप स्त्री-पुरुष
के संयोग
से उत्पन्न हुआ है; इसलिये केवल भोगों को भोगने के लिये ही है, इसके सिवा और क्या है ।8। इस प्रकार इस मिथ्या ज्ञान
को अवलम्बन करके नष्ट हो गया है स्वभाव जिनका तथा मन्द है बुद्धि जिनकी, ऐसे वे सबका अपकार करनेवाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्
का नाश करने
के लिये ही उत्पन्न होते हैं ।9। वे मनुष्य दम्भ, मान और मद
से युक्त हुए किसी प्रकार भी न पूर्ण होने वाली कामनाओं
का आसरा लेकर तथा अज्ञान
से मिथ्या सिद्धान्तों
को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों
से युक्त हुए संसार
में बर्तते हैं ।10। वे मरणपर्यन्त रहनेवाली अनन्त चिन्ताओं
को आश्रय किये हुए और विषयभोगों
के भोगने
में तत्पर हुए एवं इतनामात्र ही आनन्द है, ऐसे माननेवाले हैं ।11। इसलिये आशारूप सैकड़ों फाँसियों
से बँधे हुए और काम-क्रोध के परायण हुए विषय-भोगों
की पूर्ति
के लिये अन्यायपूर्वक धनादिक बहुत से पदार्थों
को संग्रह करने
की चेष्टा करते हैं ।12। उन पुरुषों
के विचार इस प्रकार
के होते हैं कि मैंने आज यह तो पाया है और इस मनोरथ
को प्राप्त होऊँगा तथा मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह होवेगा ।13। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं
को भी मैं मारूँगा तथा मैं ईश्वर और ऐश्वर्य
को भोगनेवाला हूँ और मैं सब सिद्धियों
से युक्त एवं बलवान् और सुखी हूँ ।14। मैं बड़ा धनवान् और बड़े कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है, मैं यज्ञ करुँगा, दान दूँगा, हर्ष
को प्राप्त होऊँगा, इस प्रकार
के अज्ञान
से मोहित हैं ।15।
इसलिये वे अनेक प्रकार
से भ्रमित हुए चित्तवाले अज्ञानीजन मोहरूप जाल
में फँसे हुए एवं विषयभोगों
में अत्यन्त आसक्त हुए महान् अपवित्र नरक
में गिरते हैं ।16। वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले घमण्डी पुरुष धन और मान
के मद
से युक्त हुए, शास्त्रविधि
से रहित केवल
नाम मात्र के यज्ञोंद्वारा पाखण्ड से यजन करते हैं ।17। वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि
के परायण हुए एवं दूसरों
की निन्दा करनेवाले पुरुष अपने और दूसरों
के शरीर
में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले हैं ।18। ऐसे उन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों
को मैं संसार
में बारंबार आसुरी योनियों
में ही गिराता हूँ अर्थात् शूकर, कूकर आदि नीच योनियों
में ही उत्पन्न करता हूँ ।19। इसलिये हे अर्जुन ! वे मूढ़ पुरुष जन्म-जन्म
में आसुरीयोनि
को प्राप्त हुए मेरे
को न प्राप्त होकर उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात घोर नरकों
में पड़ते हैं ।20।
हे अर्जुन ! काम, क्रोध तथा लोभ यह तीन प्रकार
के नरक
के द्वार आत्मा
का नाश करनेवाले हैं अर्थात् अधोगति
में ले जानेवाले हैं, इससे तीनों
को त्याग देना चाहिये ।21। क्योंकि हे अर्जुन ! इन तीनों नरक
के द्वारों
से मुक्त हुआ अर्थात् काम, क्रोध और लोभादि विकारों
से छूटा हुआ पुरुष अपने कल्याण
का आचरण करता है इससे वह परम गति
को जाता है अर्थात मेरे
को प्राप्त होता है ।22। जो पुरुष शास्त्र
की विधि
को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि
को प्राप्त होता है और न परमगति
को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है ।23। इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्य
की व्यवस्था
में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि
से नियत किये हुए कर्म
को ही करने
के लिये योग्य है ।24।
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इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में "दैवासुरसम्पद्विभागयोग" नामक सोलहवाँ अध्याय
।।१६।।

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