अध्याय अष्टदश् (18)
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः
उसके उपरान्त अर्जुन बोले, हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन ! हे वासुदेव ! मैं सन्यास और त्याग
के तत्व
को पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ ।1। इस प्रकार अर्जुन
के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान बोले, हे अर्जुन
! कितने ही पण्डितजन तो काम्यकर्मों
के त्याग
को संन्यास जानते हैं और कितने ही विचारकुशल पुरुष सब कर्मों
के फल
के त्याग
को त्याग कहते हैं ।2। तथा कई एक विद्वान ऐसे कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागने
के योग्य हैं और दूसरे विद्वान ऐसे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं ।3।
परन्तु हे अर्जुन ! उस त्याग
के विषय
में तू मेरे निश्चय
को सुन, हे पुरुषश्रेष्ठ ! वह त्याग सात्विक, राजस और तामस ऐसे तीनों प्रकार
का ही कहा गया है ।4। तथा यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने
के योग्य नहीं हैं, किन्तु वह निःसन्देह करना कर्तव्य है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप यह तीनों ही बुद्धिमान पुरुषों
को पवित्र करनेवाले हैं ।5। इसलिये हे पार्थ ! यह यज्ञ, दान, और तपरूप कर्म तथा और भी सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्म आसक्ति
को और फलों
को त्यागकर अवश्य करने चाहिए, ऐसा मेरा निश्चय किया हुआ मत है ।6। और हे अर्जुन ! नियत कर्म
का त्याग करना योग्य नहीं है इसलिये मोह
से उसका त्याग करना तामस कहा गया है ।7। यदि कोई मनुष्य जो कुछ कर्म है, वह सब ही दुःखरूप है ऐसे समझकर, शारीरिक क्लेश
के भय
से कर्मों
का त्याग कर दे, तो वह पुरुष उस राजस त्याग
को करके भी त्याग
के फल
को प्राप्त नहीं होता है, अर्थात् उसका वह त्याग करना व्यर्थ ही होता है ।8। हे अर्जुन ! करना कर्तव्य है ऐसे समझकर ही जो शास्त्रविधि
से नियत किया हुआ कर्तव्य कर्म आसक्ति
को और फल
को त्यागकर किया जाता है, वह ही सात्विक त्याग माना गया है अर्थात् कर्तव्यकर्मों
को स्वरूप
से न त्यागकर उनमें जो आसक्ति और फल
का त्यागना है, वही सात्विक त्याग माना गया है ।9। हे अर्जुन ! जो पुरुष अकल्याणकारक कर्म
से तो द्वेष नहीं करता है और कल्याणकारक कर्म
में आसक्त नहीं होता है, वह शुद्ध सत्वगुण
से युक्त हुआ पुरुष संशयरहित, ज्ञानवान् और त्यागी है ।10। क्योंकि देहधारी पुरुष
के द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्म त्यागे जाने
को शक्य नहीं है, इससे जो पुरुष कर्मों
के फल
का त्यागी है, वही त्यागी है ऐसे कहा जाता है ।11। सकामी पुरुषों
के कर्म
का ही अच्छा, बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकार
का फल मरने के पश्चात भी होता है और त्यागी पुरुषों
के कर्मों
का फल किसी काल
में भी नहीं होता; क्योंकि उनके द्वारा होनेवाले कर्म वास्तव
में कर्म नहीं हैं ।12।
हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मों
की सिद्धि
के लिये अर्थात् सम्पूर्ण कर्मों
के सिद्ध होने
में यह पाँच हेतु सांख्यसिद्धान्त
में कहे गये हैं, उनको तू मेरे
से भली प्रकार जान ।13। हे अर्जुन ! इस विषय
में आधार और कर्ता तथा न्यारे-न्यारे करण और नाना प्रकार
की न्यारी-न्यारी चेष्टा एवं वैसे ही पाँचवा हेतु दैव कहा गया है ।14। क्योंकि मनुष्य मन, वाणी और शरीर
से शास्त्र
के अनुसार अथवा विपरीत भी जो कुछ कर्म आरम्भ करता है, उसके यह पाँचों ही कारण हैं ।15। परंतु ऐसा होने
पर भी जो पुरुष अशुद्धबुद्धि होने
के कारण उस विषय
में केवल शुद्धस्वरूप आत्मा
को कर्ता देखता है, वह मलिन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं देखता है ।16। हे अर्जुन ! जिस पुरुष
के अन्तःकरण
में मैं कर्ता हूँ, ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सासांरिक पदार्थों
में और सम्पूर्ण कर्मों
में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों
को मारकर भी वास्तव
में न तो मारता है और न पाप
से बँधता है ।17। हे भारत ! ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय यह तीनों तो कर्म
के प्रेरक हैं अर्थात् इन तीनों
के संयोग
से तो कर्म
में प्रवृत होने
की इच्छा उत्पन्न होती है और कर्ता, करण और क्रिया यह तीनों कर्म
के संग्रह हैं अर्थात् इन तीनों
के संयोग
से कर्म बनता है ।18। उन सबमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता भी गुणों
के भेद
से सांख्यशास्त्र
में तीन-तीन प्रकार
के कहे गये हैं, उनको भी तू मेरे से भली प्रकार सुन ।19। जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों
में एक अविनाशी परमात्मभाव
को विभागरहित समभाव
से स्थित देखता है, उस ज्ञान
को तू सात्विक जान ।20। और जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान
के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों
में भिन्न-भिन्न प्रकार
के अनेक भावों
को न्यारा-न्यारा करके जानता है, उस ज्ञान
को तू राजस जान ।21। और जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर
में ही सम्पूर्णता
के सदृश आसक्त है अर्थात् जिस विपरीत ज्ञान
के द्वारा मनुष्य एक क्षणभङ्गुर नाशवान् शरीर
को ही आत्मा मानकर उसमें सर्वस्व
की भाँति आसक्त रहता है तथा जो बिना युक्तिवाला, तत्व-अर्थ
से रहित और तुच्छ है, वह ज्ञान तामस कहा गया है ।22। कर्तापन
के अभिमान
से रहित, फल
को न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना रागद्वेष
से किया हुआ है, वह कर्म सात्विक कहा जाता है ।23। और जो कर्म बहुत परिश्रम
से युक्त है तथा फल
को चाहनेवाले और अहंकारयुक्त पुरुष
द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है ।24। तथा जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य
को न विचारकर केवल अज्ञान
से आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है ।25।
हे अर्जुन ! जो कर्ता आसक्ति
से रहित और अहंकार
के वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साह से युक्त, कार्य
के सिद्ध होने और न होने
में हर्ष-शोकादि विकारों
से रहित है, वह कर्ता तो सात्विक कहा जाता है ।26। जो आसक्ति
से युक्त कर्मों
के फल
को चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरों
को कष्ट देने
के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक
से लिपायमान है, वह कर्ता राजस कहा गया है ।27। जो विक्षेपयुक्त चित्तवाला, शिक्षा
से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरे
की आजीविका
का नाशक एवं शोक करने
के स्वभाववाला, आलसी और दीर्घसूत्री है, वह कर्ता तामस कहा जाता है ।28। हे अर्जुन! तू बुद्धि
का और धारणशक्ति
का भी गुणों
के कारण तीन प्रकार
का भेद सम्पूर्णता
से विभागपूर्वक मेरे
से कहा हुआ सुन ।29। हे पार्थ ! प्रवृतिमार्ग और निवृतिमार्ग को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य
को एवं भय और अभय
को तथा बन्धन और मोक्ष
को जो बुद्धि तत्व
से जानती है, वह बुद्धि तो सात्विकी है ।30। हे पार्थ ! जिस बुद्धि
के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म
को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य
को यथार्थ नहीं जानता है, वह बुद्धि राजसी है ।31। और हे अर्जुन ! जो तमोगुण
से आवृत हुई बुद्धि अधर्म
को धर्म ऐसा मानती है तथा और भी सम्पूर्ण अर्थों
को विपरीत ही मानती है, वह बुद्धि तामसी है ।32। हे पार्थ ! ध्यानयोग
के द्वारा जिस अव्यभिचारिणी धारणा
से मनुष्य मन, प्राण, और इन्द्रियों
की क्रियाओं
को धारण करता है वह धारणा तो सात्विकी है ।33। और हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल
की इच्छावाला मनुष्य अति आसक्ति
से जिस धारणा
के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों
को धारण करता है, वह धारणा राजसी है ।34। तथा हे पार्थ ! दुष्टबुद्धिवाला मनुष्य जिस धारणा
के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख
को एवं उन्मत्तता
को भी नहीं छोड़ता है अर्थात धारण किये रहता है, वह धारणा तामसी है ।35। हे अर्जुन ! अब सुख भी तू मेरे से तीन प्रकार का सुन, हे भरतश्रेष्ठ ! जिस सुख
में साधक पुरुष भजन, ध्यान और सेवादि
के अभ्यास
से रमण करता है और दुःखों
के अन्त
को प्राप्त होता है ।36। वह सुख प्रथम साधन
के आरम्भकाल
में यद्यपि विष
के सदृष भासता है परन्तु परिणाम
में अमृत
के तुल्य है, इसलिये जो भगवत् विषयक बुद्धि
के प्रसाद
से उत्पन्न हुआ सुख है, वह सात्विक कहा गया है ।37। जो सुख विषय और इन्द्रियों
के संयोग
से होता है, वह यद्यपि भोगकाल
में अमृत
के सदृश भासता है, परन्तु परिणाम
में विष
के सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है ।38। तथा जो सुख भोगकाल
में और परिणाम
में भी आत्मा
को मोहनेवाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद
से उत्पन्न हुआ सुख तामस कहा गया है ।39। और हे अर्जुन ! पृथ्वी
में या स्वर्ग
में अथवा देवताओं
में ऐसा वह कोई भी प्राणी नहीं है कि जो इन प्रकृति
से उत्पन्न हुए तीनों गुणों
से रहित हो ।40।
इसलिये हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों
के तथा शूद्रों
के भी कर्म स्वभाव
से उत्पन्न हुए गुणों के अनुसार विभक्त किये गये हैं अर्थात् पूर्वकृत कर्मों
के संस्काररूप स्वभाव
से उत्पन्न हुए गुणों
के अनुसार विभक्त किये गये हैं ।41। उनमें अन्तःकरण
का निग्रह, इन्द्रियों
का दमन, बाहर-भीतर
की शुद्धि, धर्म
के लिये कष्ट सहन करना और क्षमाभाव एवं मन, इन्द्रियों और शरीर
की सरलता, आस्तिक बुद्धि, शास्त्रविषयक ज्ञान और परमात्वतत्व
का अनुभव भी, ये तो ब्राह्मण
के स्वाभाविक कर्म हैं ।42। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध
में भी न भागने
का स्वभाव एवं दान और स्वामीभाव अर्थात् निःस्वार्थभाव
से सबका हित सोचकर शास्त्राज्ञानुसार शासनद्वारा प्रेम
के सहित पुत्रतुल्य प्रजा
को पालन करने
का भाव - ये सब क्षत्रिय
के स्वाभाविक कर्म हैं ।43। खेती, गौपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार, ये वैश्य
के स्वाभाविक कर्म हैं और सब वर्णों
की सेवा करना, यह शूद्र
का भी स्वाभाविक कर्म है ।44। एवं इस अपने-अपने स्वाभाविक कर्म
में लगा हुआ मनुष्य भगवत्-प्राप्तिरूप परमसिद्धि
को प्राप्त होता है, परंतु जिस प्रकार
से अपने स्वभाविक कर्म
में लगा हुआ मनुष्य परमसिद्धि
को प्राप्त होता है, उस विधि
को तू मेरे
से सुन ।45। हे अर्जुन ! जिस परमात्मा
से सर्वभूतों
की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्वजगत् व्याप्त है । उस परमेश्वर
को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर परमसिद्धि को प्राप्त होता है ।46। इसलिये अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म
से गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म
को करता हुआ मनुष्य पाप
को नहीं प्राप्त होता है ।47। अतएव हे कुन्तीपुत्र ! दोषयुक्त भी स्वाभाविक कर्म को नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धूएँ से अग्नि
के सदृश सब ही कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं ।48। हे अर्जुन ! सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला सपृहारहित और जीते हुए अन्तःकरण वाला पुरुष, सांख्ययोग के द्वारा भी परम नैष्कर्म्य सिद्धि
को प्राप्त होता है अर्थात् क्रियारहित शुद्धसच्चिदानन्दघन परमात्मा
की प्राप्तिरूप परमसिद्धि
को प्राप्त होता है ।49। इसलिये हे कुन्तीपुत्र! अन्तःकरण की शुद्धिरूप सिद्धि
को प्राप्त हुआ पुरुष सांख्ययोग के द्वारा सच्चिदानन्दघन ब्रह्म
को प्राप्त होता है तथा जो तत्वज्ञानकी परानिष्ठा है, उसको भी तू मेरे से संक्षेप से जान ।50।
हे अर्जुन ! विशुद्ध बुद्धि से युक्त, एकान्त और शुद्ध देश
का सेवन करनेवाला तथा मिताहारी, जीते हुए मन, वाणी, शरीरवाला और दृढ़ वैराग्य को भली प्रकार प्राप्त हुआ पुरुष निरन्तर ध्यानयोग के परायण हुआ, सात्विक धारणा से अन्तःकरण को वश में करके तथा शब्दादिक विषयों को त्यागकर और राग-द्वेषों को नष्ट करके ।51-52। तथा अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और संग्रह को त्यागकर ममतारहित और शान्त अन्तःकरण हुआ, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव होने के लिये योग्य होता है ।53। फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित हुआ प्रसन्नचित्तवाला पुरुष न तो किसी वस्तु के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा करता है एवं सब भूतों में समभाव हुआ मेरी पराभक्ति को प्राप्त होता है ।54। उस पराभक्ति के द्वारा मेरे
को तत्व
से भली प्रकार जानता है कि मैं जो और जिस प्रभाववाला हूँ तथा उस भक्ति से मेरे को तत्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रवेश हो जाता है अर्थात् अनन्यभाव से मेरे को प्राप्त हो जाता है, फिर उसकी दृष्टि में मुझ वासुदेव के सिवा और कुछ नहीं रहता ।55।
मेरे परायण हुआ निष्कामकर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है ।56। इसलिये हे अर्जुन ! तू सब कर्मों को मन से मेरे में अर्पण करके मेरे में परायण हुआ समत्वबुद्धिरूप निष्कामकर्मयोग का अवलम्बन करके निरन्तर मेरे में चित्त वाला हो ।57। इस प्रकार तू मेरे में निरन्तर मनवाला हुआ मेरी कृपा से जन्म-मृत्यु आदि सब संकटों को अनायास ही तर जायेगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को नहीं सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा ।58। जो तू अहंकार को अवलंबन करके ऐसा मानता है कि मैं युद्ध नहीं करुंगा तो यह तेरा निश्चय मिथ्या है क्योंकि क्षत्रियपन का स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध
में लगा देगा ।59।
हे अर्जुन ! जिस कर्म को तू मोह से नहीं करना चाहता है उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा ।60। क्योंकि हे अर्जुन ! शरीररूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमाता हुआ सबभूतप्राणियों के हृदय
में स्थित है ।61। इसलिये हे भारत ! सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही अनन्यशरण को प्राप्त हो । उस परमात्मा की कृपा से ही परमशान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा ।62। इस प्रकार यह गोपनीय से भी अतिगोपनीय ज्ञान मैंने तेरे लिये कहा है, इस रहस्ययुक्त ज्ञान को सम्पूर्णता से अच्छी प्रकार विचार के फिर तू जैसा चाहता है वैसा ही कर अर्थात जैसी तेरी इच्छा हो वैसे ही कर ।63। इतना कहने पर भी अर्जुन
का कोई उत्तर नहीं मिलने के कारण श्रीकृष्ण भगवान् फिर बोले कि हे अर्जुन ! सम्पूर्ण गोपनीयों से भी अति गोपनीय मेरे परमरहस्ययुक्त वचनों को तू फिर भी सुन क्योंकि तू मेरा अतिशय प्रिय है इससे यह परम हितकारक वचन मैं तेरे लिये कहूँगा ।64। हे अर्जुन ! तू केवल मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य निरन्तर अचल मनवाला हो और मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा भक्तिसहित निष्कामभाव से नाम, गुण और प्रभाव के श्रवण, कीर्तन, मनन और पठन-पाठन द्वारा निरन्तर भजने वाला हो तथा मेरा (शंङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट, कुण्डल आदि भूषणों से युक्त, पीताम्बर, वनमाला और कौस्तुभमणिधारी विष्णु
का) मनवाणी और शरीर के द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा भक्ति और प्रेम से विह्वलतापूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ सर्वशक्तिमान, विभूति, बल, ऐश्वर्य, माधुर्य, गंभीरता, उदारता, वात्सल्य और सुहृदता आदि गुणों से सम्पन्न सबके आश्रयरूप वासुदेव को विनयभावपूर्वक भक्तिसहित साष्टांङ्ग दण्डवत् प्रणाम कर । ऐसा करने से तू मेरे को ही प्राप्त होगा, यह मैं तेरे लिये सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यंन्त प्रिय सखा है ।65। इसलिये सर्वधर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्मों के आश्रय को त्यागकर केवल एक मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा की ही अनन्य शरण को प्राप्त हो मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ।66।
हे अर्जुन ! इस प्रकार तेरे हित के लिये कहे हुए इस गीतारूप परमरहस्य को किसी काल में भी तपरहित मनुष्य के प्रति नहीं कहना चाहिये और भक्तिरहित के प्रति तथा बिना सुनने की इच्छावाले के भी प्रति
नहीं कहना चाहिये एवं जो मेरी निन्दा करता है उसके प्रति भी नहीं कहना चाहिए परन्तु जिनमें यह सब दोष नहीं हों, ऐसे भक्तों के प्रति प्रेमपूर्वक, उत्साह
के सहित कहना चाहिए क्योंकि जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परमरहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा अर्थात् निष्कामभाव से प्रेमपूर्वक मेरे भक्तों को पढ़ावेगा, अर्थ की व्याख्या द्वारा इसका प्रचार करेगा वह निःसन्देह मेरे को ही प्राप्त होगा ।68। और न तो उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्यों में कोई है और न उससे बढ़कर मेरा अतिशय प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्यों में कोई होवेगा ।69। तथा हे अर्जुन ! जो पुरुष इस धर्ममय हमदोनों के संवादरूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा ऐसा मेरा मत है ।70। जो पुरुष श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि
से रहित हुआ इस गीता शास्त्र का श्रवणमात्र भी करेगा वह भी पापों से मुक्त हुआ उत्तम कर्म करनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होवेगा ।71।
इस प्रकार गीता का महात्म्य कहकर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द ने अर्जुन से पूछा हे पार्थ
! क्या यह मेरा वचन तुमने एकाग्रचित्त से श्रवण किया ? और हे धनंजय क्या अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ ? ।72। इस प्रकार भगवान् के पूछने पर अर्जुन बोले हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है, इसलिये मैं संशयरहित हुआ स्थित हूँ अतः आपकी आज्ञा
का पालन करुँगा ।73।
इसके उपरान्त संजय बोले, हे राजन् ! इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त और रोमांचकारक संवाद को सुना ।74। कैसे कि श्रीव्यासजी की कृपा से दिव्यदृष्टि द्वारा मैंने इस परम रहस्ययुक्त गोपनीय योग को साक्षात् कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान् से सुना है ।75। इसलिये हे राजन् श्रीकृष्णभगवान् और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बारंबार हर्षित होता हूँ ।76। तथा हे राजन् ! श्रीहरि के उस अति अद्भुतरूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ ।77। हे राजन् ! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है ।78
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इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में "मोक्षसन्यासयोग" नामक अठारहवां अध्याय ।।१८।।

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