श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय त्रयोदश (13)
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः
अध्याय त्रयोदश (13)
*********************
उसके उपरान्त श्रीकृष्ण भगवान् फिर बोले, हे अर्जुन ! यह शरीर क्षेत्र है ऐसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको क्षेत्रज्ञ, ऐसा उनके तत्व
को जानने
वाले ज्ञानीजन कहते हैं ।1। और हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों
में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मेरे
को ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ
का अर्थात विकारसहित प्रकृति
का और पुरुष
का जो तत्व
से जानना है वह ज्ञान है, ऐसा मेरा मत है ।2। इसलिये वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों
वाला है और जिस कारण
से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप
से मेरे
से सुन ।3। यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
का तत्व ऋषियों
द्वारा बहुत प्रकार
से कहा गया है अर्थात् समझाया गया है और नाना प्रकार
के वेदमन्त्रों
से विभागपूर्वक कहा गया है तथा अच्छी प्रकार निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र
के पदों
द्वारा भी वैसे ही कहा गया है ।4। हे अर्जुन! वही मैं तेरे लिये कहता हूँ कि पाँच महाभूत अर्थात् आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी
का सूक्ष्मभाव, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया भी तथा दस इन्द्रियाँ अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना, और घ्राण एवं वाक्, हस्त, पाद, उपस्थ, गुदा, एक मन और पाँच इन्द्रयों
के विषय अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ।5। तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और स्थूलदेह
का पिण्ड एवं चेतनता और धृति इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों
सहित संक्षेप
से कहा गया ।6।
हे अर्जुन ! श्रेष्ठता
के अभिमान
का अभाव, दम्भाचरण
का अभाव, प्राणिमात्र
को किसी प्रकार भी न सताना और क्षमाभाव तथा मन-वाणी
की सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरु
की सेवा, बाहर-भीतर
की शुद्धि, अन्तःकरण
की स्थिरता, मन और इन्द्रियोंसहित शरीर
का निग्रह ।7। इस लोक और परलोक
के सम्पूर्ण भोगों
में आसक्ति
का अभाव और अहंकार
का भी अभाव एवं जन्म-मृत्यु-जरा और रोग आदि
में दुःख-दोषों
का बारंबार विचार करना ।8। पुत्र, स्त्री, घर और धनादि
में आसक्ति
का अभाव और ममता
का न होना तथा प्रिय-अप्रिय
की प्राप्ति
में सदा ही चित्त
का सम रहना अर्थात् मन
के अनुकूल तथा प्रतिकूल
के प्राप्त होने
पर हर्ष-शोकादि विकारों
का न होना ।9। मुझ परमेश्वर
में एकीभाव
से स्थितिरूप ध्यानयोग
के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश
में रहने
का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों
के समुदाय
में प्रेम
का न होना ।10। तथा अध्यात्मज्ञान
में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान
के अर्थरूप परमात्मा
को सर्वत्र देखना, यह सब तो ज्ञान है और जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है ऐसे कहा है ।11। हे अर्जुन! जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द
को प्राप्त होता है, उसको अच्छी प्रकार कहूँगा, वह आदि-रहित, परम ब्रह्म अकथनीय होने
से न सत् कहा जाता है और न असत् ही कहा जाता है ।12। परंतु वह सब ओर
से हाथ-पैरवाला एवं सब ओर
से नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर
से श्रोत्रवाला है; क्योंकि वह संसार
में सबको व्याप्त करके स्थित है ।13। और सम्पूर्ण इन्द्रियों
से रहित है तथा आसक्तिरहित और गुणों
से अतीत हुआ भी अपनी योगमाया
से सबको धारण-पोषण करनेवाला और गुणों
से अतीत हुआ भी अपनी योगमाया
से सबको धारण-पोषण करनेवाला और गुणों
को भोगनेवाला है ।14। तथा वह परमात्मा चराचर सब भूतों
के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है तथा अति समीप
में और दूर
में भी स्थित वही है ।15। और वह विभागरहित एकरूप
से आकाश
के सदृश परिपूर्ण हुआ भी चराचर सम्पूर्ण भूतों
में पृथक्-पृथक् के सदृश स्थित प्रतीत होता है तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा, विष्णुरूप
से भूतों
को धारण-पोषण करनेवाला और रुद्ररूप
से संहारकरनेवाला तथा ब्रह्मारूप
से सबको उत्पन्न करनेवाला है ।16। वह ब्रह्म ज्योतियों
का भी ज्योति एवं माया
से अति परे कहा जाता है तथा वह परमात्मा बोधस्वरूप और जानने
के योग्य है एवं तत्वज्ञान
से प्राप्त होनेवाला और सबके हृदय
में स्थित है ।17। हे अर्जुन ! इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जाननेयोग्य परमात्मा
का स्वरूप संक्षेप
से कहा गया, इसको तत्व
से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप
को प्राप्त होता है ।18।
हे अर्जुन ! प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी मेरी माया और जीवात्मा अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों
को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों
को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों
को भी प्रकृति
से ही उत्पन्न हुए जान ।19। क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने
में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों
के भोक्तापन
में अर्थात् भोगने में हेतु कहा जाता है ।20। परंतु प्रकृति
में स्थित हुआ ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए त्रिगुणात्मक सब पदार्थों
को भोगता है और इन गुणों
का सङ्ग ही इस जीवात्मा
के अच्छी
- बुरी योनियों
में जन्म लेने का कारण है ।21। वास्तव
में तो यह पुरुष इस देह
में स्थित हुआ भी पर अर्थात् त्रिगुणमयी माया
से सर्वथा अतीत ही है, केवल साक्षी होने
से उपदृष्टा और यथार्थ सम्मति देने
वाला होने
से अनुमन्ता एवं सबको धारण करनेवाला होने
से भर्ता, जीवनरूप
से भोक्ता तथा ब्रह्मादिकों
का भी स्वामी होने
से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने
से परमात्मा, ऐसा कहा गया है ।22। इस प्रकार पुरुष
को और गुणों
के सहित प्रकृति
को जो मनुष्य तत्व
से जानता है वह सब प्रकार
से बर्तता हुआ भी फिर नहीं जन्मता है अर्थात् पुनर्जन्म
को नहीं प्राप्त होता है ।23। हे अर्जुन ! उस परम पुरुष परमात्मा
को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान
के द्वारा हृदय
में देखते हैं तथा अन्य कितने ही ज्ञानयोग
के द्वारा देखते हैं और अपर कितने ही निष्कामकर्मयोग
के द्वारा देखते हैं ।24। परंतु इनसे दूसरे अर्थात
जो मन्दबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात् तत्व
के जाननेवाले पुरुषों
से सुनकर ही उपासना करते हैं अर्थात् उन पुरुषों
के कहने
के अनुसार ही श्रद्धासहित तत्पर हुए साधन करते हैं और वे सुनने
के परायण हुए पुरुष भी मृत्युरूप संसारसागर
को निःसंदेह तर जाते हैं ।25। हे अर्जुन ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर, जङ्गम वस्तु उत्पन्न होती है, उस सम्पूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
के संयोग
से ही उत्पन्न हुई जान अर्थात् प्रकृति और पुरुष
के परस्पर
के सम्बन्ध
से ही जगत् की स्थिति है, वास्तव
में तो सम्पूर्ण जगत् नाशवान् और क्षणभङ्गुर होने
से अनित्य है ।26।
इस प्रकार जानकर जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों
में नाशरहित परमेश्वर
को समभाव
से स्थित देखता है, वही देखता है ।27। क्योंकि वह पुरुष सब
में समभाव
से स्थित हुए परमेश्वर
को समान देखता हुआ अपने द्वारा स्वयं
को नष्ट नहीं करता है अर्थात् शरीर
का नाश होने
से अपने आत्मा
का नाश नहीं मानता है, इससे वह परमगति
को प्राप्त होता है ।28। और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों
को सब प्रकार
से प्रकृति
से ही किये हुए देखता है अर्थात इस बात
को तत्व
से समझ लेता है कि प्रकृति
से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों
में बर्तते हैं तथा आत्मा
को अकर्ता देखता है, वही देखता है ।29। और यह पुरुष जिस काल
में भूतों
के न्यारे-न्यारे भाव
को एक परमात्मा
के संकल्प
के आधार स्थित देखता है तथा उस परमात्मा
के संकल्प
से ही सम्पूर्ण भूतों
का विस्तार देखता है, उस काल
में सच्चिदानन्दघन ब्रह्म
को प्राप्त होता है ।30। हे अर्जुन ! अनादि होने
से और गुणातीत होने
से यह अविनाशी परमात्मा शरीर
में स्थित हुआ भी वास्तव
में न करता है और न लिपायमान होता है ।31। जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होने
के कारण लिपायमान नहीं होता है, वैसे ही सर्वत्र देह
में स्थित हुआ भी आत्मा गुणातीत होने
के कारण देह
के गुणों
से लिपायमान नहीं होता है ।32। हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र
को प्रकाशित करता है अर्थात् नित्यबोधस्वरूप एक आत्मा
की ही सत्ता
से सम्पूर्ण जडवर्ग प्रकाशित होता है ।33। इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
के भेद
को तथा विकारसिहत प्रकृति
से छूटने
के उपाय
को जो पुरुष ज्ञाननेत्रोंद्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा
को प्राप्त होते हैं ।34।
*********************
इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में "क्षेत्रक्षेत्रज्ञविज्ञानयोग" नामक तेरहवाँ अध्याय ।।१३।।

Comments
Post a Comment