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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय त्रयोदश (13)

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  ओउम् श्रीपरमात्मने नमः अध्याय त्रयोदश ( 13 ) ********************* उसके उपरान्त श्रीकृष्ण भगवान् फिर बोले , हे अर्जुन ! यह शरीर क्षेत्र है ऐसे कहा जाता है और इसको जो जानता है , उसको क्षेत्रज्ञ , ऐसा उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं । 1 । और हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मेरे को ही जान और क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का अर्थात विकारसहित प्रकृति का और पुरुष का जो तत्व से जानना है वह ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है । 2 । इसलिये वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है , वह सब संक्षेप से मेरे से सुन । 3 । यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है अर्थात् समझाया गया है और नाना प्रकार के वेदमन्त्रों से विभागपूर्वक कहा गया है तथा अच्छी प्रकार निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी वैसे ही कहा गय...