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शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते

रश्मिरथी : तृतीय सर्ग, भाग 1 हो गया पूर्ण अज्ञात वास,  पाडंव लौटे वन से सहास, पावक में कनक-सदृश तप कर,  वीरत्व लिए कुछ और प्रखर, नस-नस में तेज-प्रवाह लिये,  कुछ और नया उत्साह लिये। सच है, विपत्ति जब आती है,  कायर को ही दहलाती है, शूरमा नहीं विचलित होते,  क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं,  काँटों में राह बनाते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं,  संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं,  उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाने को,  बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। है कौन विघ्न ऐसा जग में,  टिक सके वीर नर के मग में खम ठोंक ठेलता है जब नर,  पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है,  पत्थर पानी बन जाता है। गुण बड़े एक से एक प्रखर,  हैं छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो,  वर्तिका-बीच उजियाली हो। बत्ती जो नहीं जलाता है,  रोशनी नहीं वह पाता है। पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,  झरती रस की धारा अखण्ड, मेंहदी जब सहती है प्रहार,  बनती ललनाओं का सिंगार। जब फूल पिरोये जाते हैं,  हम उन...

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं समाना चाहता, जो बीन उर में विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं जिसे निशि खोजती तारे जलाकर उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं कली की पंखुडीं पर ओस-कण में रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं दबी सी आ...

अध्याय अष्टदश् (18)

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  ओउम् श्रीपरमात्मने नमः अध्याय अष्टदश् ( 1 8) ********************* उसके उपरान्त अर्जुन बोले , हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन ! हे वासुदेव ! मैं सन्यास और त्याग के तत्व को पृथक - पृथक जानना चाहता हूँ । 1 । इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्रीकृष्णभगवान बोले , हे अर्जुन ! कितने ही पण्डितजन तो काम्यकर्मों के त्याग को संन्यास जानते हैं और कितने ही विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं । 2 । तथा कई एक विद्वान ऐसे कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त हैं , इसलिये त्यागने के योग्य हैं और दूसरे विद्वान ऐसे कहते हैं कि यज्ञ , दान और तपरूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं । 3 । परन्तु हे अर्जुन ! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन , हे पुरुषश्रेष्ठ ! वह त्याग सात्विक , राजस और तामस ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है । 4 । तथा यज्ञ , दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नहीं हैं , किन्तु वह निःसन्देह करना कर्तव्य है ; क्योंकि यज्ञ , दान और तप यह तीनों ही बु...