अध्याय 2 श्रीमद्भगवद्गीता
ओउम् श्रीपरमात्मने नमः द्वितीय अध्याय ************************************ संजय बोले कि पूर्वोक्त प्रकार से करूणा करके व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा । 1 । हे अर्जुन ! तुमको इस विषमस्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआ ? क्योंकि यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों से आचरण किया गया है , न स्वर्ग को देने वाला है , न कीर्ति को करनेवाला है । 2 । इसलिये हे अर्जुन नपुंसकता को प्राप्त मत हो , यह तेरे योग्य नहीं है। हे परंतप ! तुच्छ हृदय की दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिये खड़ा हो । 3 । तब अर्जुन बोले कि हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के प्रति किस प्रकार बाणों को करके युद्ध करुँगा , क्योंकि हे अरिसूदन ! वे दोनों ही पूजनीय हैं । 4 । इसलिये इन महानुभाव गुरूजनों को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न भी भोगना कल्याणकारक समझता हूँ , क्योंकि गुरूजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा । 5 । और हमलोग यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये क्या करना श्रेष्ठ ह...