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अध्याय 5 श्रीमद्भगवद्गीता

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  ओउम् श्रीपरमात्मने नमः पंचम अध्याय *********************************** उसके उपरान्त अर्जुन ने पूछा - हे कृष्ण ! आप कर्मों के संन्यास की और फिर निष्कामकर्मयोग की प्रशंसा करते हैं , इसलिये इन दोनों में एक जो निश्चय किया हुआ कल्याणकारक होवे , उसको मेरे लिये कहिये । 1 । इस प्रकार अर्जन के पूछने पर श्रीकृष्ण महाराज बोले, हे अर्जुन ! कर्मों का संन्यास (अर्थात मन, इन्द्रयों और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग) और निष्कामकर्मयोग (अर्थात समत्व-बुद्धि से भगवत-अर्थ कर्मों का करना) यह दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परंतु उन दोनों में भी कर्मों के संन्यास से निष्काम-कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है ।2। इसलिये हे अर्जन ! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकाङ्क्षा करता है, वह निष्कामकर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है, क्योंकि राग-द्वेष आदि द्वन्दों से रहित हुआ पुरुष सुखपूर्वक संसाररूप बन्धन से मुक्त हो जाता है ।3। हे अर्जुन ! ऊपर कहे हुए संन्यास और निष्कामकर्मयोग को मूर्खलोग अलग-अलग फलवाले कहते हैं न कि पण्डितजन; क्योंकि दोनों...