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अध्याय 3 श्रीमद्भगवद्गीता

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  ओउम् श्रीपरमात्मने नमः तृतीय अध्याय ************************** इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया कि हे जनार्दन ! यदि कर्मों की अपेक्षा ज्ञान आपके श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव ! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हो ? ।1। तथा आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मोहित-सी करते हैं , इसलिये उस एक बात को निश्चय करके कहिये कि जिससे मैं कल्याण को प्राप्त होऊँ ।2। इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर भगवान् श्रीकृष्ण महाराज बोले , हे निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है , ज्ञानियों की ज्ञानयोग से और योगियों की निष्कामकर्मयोग से ।3। परंतु किसी भी मार्ग के अनुसार कर्मों को स्वरूप से त्यागने की आवश्यकता नहीं है , क्योंकि मनुष्य न तो कर्मों के न करने से निष्कर्मता को प्राप्त होता है और न कर्मों को त्यागनेमात्र से भगवत्साक्षात्काररूप सिद्धि को प्राप्त होता है ।4। तथा सर्वथा कर्मों का स्वरूप से त्याग हो भी नहीं सकता , क्योंकि कोई भी पुरुष किसी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता है , निःसन्देह सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणोंद्वारा परवश हुए कर्...

अध्याय 8 श्रीमद्भगवद्गीता

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  ओउम् श्रीपरमात्मने नमः अष्टम् अध्याय (8) **************************** इस प्रकार भगवान् के वचनों को न समझकर अर्जुन बोले , हे पुरुषोत्तम ! जिसका आपने वर्णन किया है , वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है ? । 1 । हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है ? और वह इस शरीर में कैसे है ? और युक्त चित्तवाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हो ? । 2 । इस प्रकार अर्जुन के प्रश्न करने पर श्रीकृष्ण भगवान् बोले , हे अर्जुन ! परम अक्षर अर्थात जिसका कभी नाश नहीं हो , ऐसा सच्चिदानन्दघन परमात्मा तो ब्रह्म है और अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा अध्यात्म नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला शास्त्रविहित यज्ञ , दान और होम आदि के निमित्त जो द्रव्यादिकों का त्याग है , वह कर्म नाम से कहा गया है । 3 । उत्पत्ति , विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं और हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है और हे देहधारियों मे...